मैं डरता हूँ
मैं डरता हूँ ,एक अनजान सी
अजीब सी बात से
जो शायद मैं खुद भी नहीं जानता
मानो किसी बच्चे को कभी
किसी अँधेरे कमरे में अकेले छोड़ दिया गया हो
और फिर कभी रोशनी पूरी ही न हो पायी हो
मानो एक कोना अँधेरा था और अँधेरा ही
रह गया हो
एक अजीब सी झिझक है,
एक अजीब सा डर है
मैं डरता हूँ , एक अनजान सी
अजीब सी बात से
मैं डरता हूँ , अपने जैसे लोगों का
सामना करने से
मैं डरता हूँ ,एक अनजान सी
अजीब सी बात से
ये अँधेरा सा कोना जो आज भी
प्रकाशविहीन है
मानो कभी प्रकाशित ही न हुआ हो
शायद बचपन की कोई बात हो ,
जो अनकही ही रह गयी हो
शायद कोई चीज़ , जिसे पाने की
अथक कोशिश हमेशा नाकामयाब रही हो
शायद कोई डांट जो मस्तिष्क के एक
कोने में घर कर गयी हो
मैं डरता हूँ , एक अनजान सी
अजीब सी बात से
मानो बचपन में कोई पसंदीदा
खिलौना खोने का डर हो
ये डर शायद विचित्र सी दुनिया को,
एक बनावटी हंसी पहन कर झेलने का है
शायद इस नाटक में खुद को खोने का है
शायद कुछ पाने पे कुछ खोने जैसा है
जो भी हो , ये अजीब और अनजाना सा डर
मेरे अस्तित्व इतना ही पुराना मालूम पड़ता है
जिसे मैं अपने ज़िंदगी के हर पहलू ,हर मोड़
पे पाता हूँ
कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है ,मानो
यह कभी गया ही न हो
हमेशा साथ हो छाये की तरह ,
एक अनजान सी परछाई की तरह
जिससे भागते मैं दौड़ रहा हूँ , एक अनजान से
रास्ते पर , एक अनजान दिशा में
एक अनजान मंजिल की तरफ
शायद किसी बुरे मोड़ का डर हो
इन रास्तों पे कुछ या फिर खुद को
खोने का डर हो।
अजीब सी बात से
जो शायद मैं खुद भी नहीं जानता
मानो किसी बच्चे को कभी
किसी अँधेरे कमरे में अकेले छोड़ दिया गया हो
और फिर कभी रोशनी पूरी ही न हो पायी हो
मानो एक कोना अँधेरा था और अँधेरा ही
रह गया हो
एक अजीब सी झिझक है,
एक अजीब सा डर है
मैं डरता हूँ , एक अनजान सी
अजीब सी बात से
मैं डरता हूँ , अपने जैसे लोगों का
सामना करने से
मैं डरता हूँ ,एक अनजान सी
अजीब सी बात से
ये अँधेरा सा कोना जो आज भी
प्रकाशविहीन है
मानो कभी प्रकाशित ही न हुआ हो
शायद बचपन की कोई बात हो ,
जो अनकही ही रह गयी हो
शायद कोई चीज़ , जिसे पाने की
अथक कोशिश हमेशा नाकामयाब रही हो
शायद कोई डांट जो मस्तिष्क के एक
कोने में घर कर गयी हो
मैं डरता हूँ , एक अनजान सी
अजीब सी बात से
मानो बचपन में कोई पसंदीदा
खिलौना खोने का डर हो
ये डर शायद विचित्र सी दुनिया को,
एक बनावटी हंसी पहन कर झेलने का है
शायद इस नाटक में खुद को खोने का है
शायद कुछ पाने पे कुछ खोने जैसा है
जो भी हो , ये अजीब और अनजाना सा डर
मेरे अस्तित्व इतना ही पुराना मालूम पड़ता है
जिसे मैं अपने ज़िंदगी के हर पहलू ,हर मोड़
पे पाता हूँ
कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है ,मानो
यह कभी गया ही न हो
हमेशा साथ हो छाये की तरह ,
एक अनजान सी परछाई की तरह
जिससे भागते मैं दौड़ रहा हूँ , एक अनजान से
रास्ते पर , एक अनजान दिशा में
एक अनजान मंजिल की तरफ
शायद किसी बुरे मोड़ का डर हो
इन रास्तों पे कुछ या फिर खुद को
खोने का डर हो।
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